भारत का संवैधानिक विकास
भारत के संविधान बनने की प्रक्रिया को मुख्य रूप से दो चरणों (Phases) में बांटा जाता है:
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कंपनी का शासन (1773 से 1858): इस दौरान भारत पर ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ का राज था।
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ब्रिटिश क्राउन (सम्राट) का शासन (1858 से 1947): 1857 के विद्रोह के बाद भारत का शासन सीधे ब्रिटेन के राजा/रानी के हाथ में चला गया था।
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 (Regulating Act of 1773)
यह भारत के संवैधानिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण कानून था। इसकी मुख्य बातें ये हैं:
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संसदीय नियंत्रण: इस कानून के जरिए पहली बार ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कामकाज और प्रशासन पर अपना नियंत्रण (Control) शुरू किया।
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पहला कदम: भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित (Regularize) और नियंत्रित करने की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया यह पहला ठोस कदम था।
रेगुलेटिंग एक्ट (1773) के प्रमुख बिंदु:
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संसदीय नियंत्रण की शुरुआत: इस कानून के माध्यम से पहली बार ब्रिटिश संसद ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन (Administration) पर अपना नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया।
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ब्रिटिश सरकार का पहला कदम: भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमबद्ध (Regularize) करने और उन पर लगाम लगाने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया यह पहला आधिकारिक कदम था।
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लिखित संविधान का परिचय: इसी एक्ट के साथ पहली बार भारत में कंपनी के शासन को चलाने के लिए एक लिखित संविधान (Written Constitution) पेश किया गया, ताकि व्यवस्था नियमों के अनुसार चले।
अधिनियम के प्रावधान
इस अधिनियम (1773 का रेगुलेटिंग एक्ट) के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित थे:
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कार्यों को मान्यता: इसके द्वारा पहली बार कंपनी के प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों को आधिकारिक रूप से मान्यता प्रदान की गई।
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केंद्रीय प्रशासन की नींव: इसके माध्यम से भारत में केंद्रीय प्रशासन (Central Administration) की शुरुआत हुई।
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प्रेसिडेंसी का एकीकरण: बम्बई और मद्रास प्रेसिडेंसी को कलकत्ता प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया गया।
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पूर्व स्थिति: इस नियम से पहले, ये तीनों प्रेसिडेंसी (बम्बई, मद्रास और कलकत्ता) एक-दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र थीं।
प्रशासनिक और राजनीतिक सुधार
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मान्यता: इस अधिनियम के माध्यम से पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक और राजनीतिक कार्यों को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया गया.
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केंद्रीय प्रशासन: भारत में एक मजबूत ‘केंद्रीय प्रशासन’ की नींव इसी कानून के द्वारा रखी गई.
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प्रेसिडेंसी का एकीकरण: बम्बई और मद्रास की प्रेसिडेंसी को अब कलकत्ता प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया गया, जबकि इससे पहले ये तीनों एक-दूसरे से स्वतंत्र थीं.
गवर्नर जनरल के पद में बदलाव
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नया पदनाम: बंगाल के ‘गवर्नर’ का पद बदलकर अब ‘बंगाल का गवर्नर जनरल’ कर दिया गया.
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कार्यकारी परिषद: गवर्नर जनरल की सहायता के लिए एक 4-सदस्यीय कार्यकारी परिषद (Executive Council) का गठन किया गया.
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प्रथम नियुक्ति: बंगाल के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स बने.
नियंत्रण और संस्थागत ढांचा
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बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (BOD): इस अधिनियम के तहत ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ की स्थापना हुई, जिससे ब्रिटिश सरकार का कंपनी पर नियंत्रण और मजबूत हो गया.
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सूचना की अनिवार्यता: अब कंपनी के लिए राजस्व (Revenue), नागरिक और सैन्य मामलों की सारी जानकारी ब्रिटिश सरकार को देना अनिवार्य कर दिया गया.
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सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना: अधिनियम के तहत 1774 में कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई.
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इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य सदस्य थे.
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पहले मुख्य न्यायाधीश एलिजा इम्पे थे.
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अन्य तीन सदस्य चैंबर्स, लीमेंस्टर और हाइड थे.
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भ्रष्टाचार पर रोक
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निजी व्यापार पर प्रतिबंध: कंपनी के कर्मचारियों को बिना लाइसेंस के निजी व्यापार करने से मना कर दिया गया.
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उपहार और रिश्वत: कर्मचारियों द्वारा भारतीय लोगों से किसी भी तरह का उपहार या रिश्वत लेना पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया.
1781 का एक्ट ऑफ सेटलमेंट (Act of Settlement)
यह अधिनियम 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए पारित किया गया एक ‘संशोधन अधिनियम’ था। इसके मुख्य प्रावधान निम्नलिखित थे:
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सुप्रीम कोर्ट से मुक्ति: गवर्नर जनरल और उसकी परिषद (Council) को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया।
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राजस्व मामले बाहर: राजस्व संग्रह और राजस्व से जुड़े सभी मुद्दों को भी सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया, जिससे कंपनी को कर वसूलने में आसानी हो।
पिट्स इंडिया एक्ट (1784)
इस अधिनियम को ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट द्वारा प्रस्तुत किया गया था.
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पूर्ण नियंत्रण: ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यों और प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त हुआ.
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ब्रिटिश आधिपत्य: भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को पहली बार ‘ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र’ कहा गया.
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दोहरा प्रशासन: भारत में दोहरे प्रशासन की शुरुआत हुई, जिसमें कंपनी के राजनीतिक और व्यापारिक कार्यों को अलग-अलग कर दिया गया.
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बोर्ड ऑफ कंट्रोल (BOC): राजनीतिक कार्यों के प्रबंधन के लिए इंग्लैंड में 6 सदस्यीय ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ नामक निकाय बनाया गया.
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बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (BOD): व्यापारिक कार्य बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के अधीन ही रहे.
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परिषद में बदलाव: गवर्नर जनरल की परिषद की सदस्य संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई.
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प्रांतीय सरकारों पर नियंत्रण: मद्रास और बम्बई की सरकारों को पूरी तरह से बंगाल सरकार के अधीन कर दिया गया.
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गवर्नर जनरल की शक्तियाँ: गवर्नर जनरल को प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त करने का अधिकार दिया गया. साथ ही, देशी राजाओं से युद्ध या संधि करने से पहले BOD से स्वीकृति लेना अनिवार्य कर दिया गया.
चार्टर एक्ट 1793 (Charter Act of 1793)
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व्यापारिक अधिकारों का विस्तार: कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को अगले 20 वर्षों की अवधि के लिए बढ़ा दिया गया।
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वेतन का स्रोत: ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ (BoC) के सदस्यों और कर्मचारियों को भारतीय राजस्व से वेतन देने का प्रावधान किया गया।
1813 का चार्टर अधिनियम: मुख्य प्रावधान
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कंपनी के कार्यकाल में वृद्धि: ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार पत्र (Charter) को अगले 20 वर्षों के लिए और बढ़ा दिया गया।
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व्यापारिक एकाधिकार की समाप्ति: भारत के साथ व्यापार करने का कंपनी का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया। अब भारतीय व्यापार को सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए खोल दिया गया।
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अपवाद (चाय और चीन): हालाँकि, चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बरकरार रखा गया।
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ईसाई मिशनरियों का आगमन: ईसाई पादरियों को भारत आने और धर्म प्रचार करने की विधिवत अनुमति दी गई।
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शिक्षा पर निवेश: भारत में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए पहली बार सालाना 1 लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया।
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स्थानीय सरकारों को शक्ति: इसके तहत स्थानीय स्वायत्त सरकारों को व्यक्तियों पर कर (Tax) लगाने का अधिकार दिया गया।
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संवैधानिक स्थिति: इस अधिनियम के माध्यम से पहली बार भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया।
1833 का चार्टर अधिनियम (Charter Act of 1833)
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केन्द्रीकरण: ब्रिटिश भारत के केन्द्रीकरण की दिशा में यह अधिनियम एक महत्वपूर्ण कदम था।
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संविधान निर्माण के संकेत: भारत में ब्रिटिश राज के दौरान संविधान निर्माण के प्रथम संकेत इसी एक्ट में मिलते हैं।
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भारत सरकार: इसके तहत गवर्नर जनरल की सरकार को ‘भारत सरकार’ और उसकी परिषद को ‘भारत परिषद’ के रूप में जाना जाने लगा।
अधिनियम के मुख्य प्रावधान:
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भारत का गवर्नर जनरल: इसके तहत बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया।
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भारत के गवर्नर जनरल को सभी नागरिक और सैन्य शक्तियाँ प्रदान की गईं।
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उसे पूरे ब्रिटिश भारत में विधि निर्माण (कानून बनाने) का एकाधिकार दिया गया।
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पहले बनाए गए कानूनों को ‘नियामक कानून’ कहा गया, जबकि इस नए कानून के तहत बने कानूनों को ‘एक्ट’ या ‘अधिनियम’ कहा गया।
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गवर्नर जनरल को पूरे देश के लिए एक ही बजट तैयार करने का अधिकार दिया गया।
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लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत के पहले गवर्नर जनरल बने।
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व्यापारिक एकाधिकार की समाप्ति: कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए। अब कंपनी का एकमात्र कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से भारत पर शासन करना था।
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सिविल सेवा: इसके तहत सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता का आयोजन शुरू करने का प्रयास किया गया।
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समान अवसर: अधिनियम में कहा गया था कि भारतीयों को कंपनी में किसी भी पद, कार्यालय और रोजगार को हासिल करने से वंचित नहीं किया जाएगा। (हालांकि, कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स – BOD के विरोध के बाद इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया था)।
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विधि सदस्य (Law Member): गवर्नर जनरल की परिषद में एक ‘विधि सदस्य’ की नियुक्ति की गई। लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में प्रथम विधि आयोग का गठन किया गया।
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दास प्रथा का अंत: भारत में दास प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया। 1843 में लॉर्ड एलेनबरो ने दास प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
1853 का चार्टर अधिनियम
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सिविल सेवा में सुधार: सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता व्यवस्था का आरम्भ किया गया।
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सिविल सेवा भारतीयों के लिए भी खोल दी गयी, इसके लिए मैकाले समिति (1854) गठित की गई थी।
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बंगाल का प्रशासन: बंगाल के लिए पृथक उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) की व्यवस्था की गई।
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शक्तियों का पृथक्करण: पहली बार गवर्नर जनरल के विधायी कार्य व प्रशासनिक कार्य अलग किए गए।
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विधि सदस्य: विधि सदस्य को गवर्नर जनरल की परिषद का पूर्ण सदस्य का दर्जा प्रदान किया गया।
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विधान परिषद: सम्पूर्ण भारत के लिए एक पृथक विधान परिषद की स्थापना की गई।
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निदेशक मंडल (BOD): इसने निदेशक मंडल के सदस्यों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी।
